वैसी आर्थिक प्रणाली जिसमें व्यक्तियों, सामानों और नौकरियों का एक देश से दूसरे देश तक रूपांतरित होता है। उसे वैश्वीकरण कहते हैं।
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Hellow दोस्तों, नमस्कार तो आज के इस पोस्ट पर हम भूमंडलीकृत विश्व का बनना नोटस् के बारे मे जानेंगे तो चलिए शुरू करते हैं आज के पोस्ट को…
इस पोस्ट पर के Topics -:
•वैश्वीकरण किसे कहते हैं?
•भूमंडलीकरण का परिभाषा
•प्राचीन काल
•रेशम मार्ग
•रेशम मार्ग की विशेषता
•भोजन की यात्रा
•अमेरिका का खोज
•यूरोपियन का अमेरिका पर विजय
•यूरोप की समस्याएं
•18 वीं सदी तक भारत और चीन
•19वीं शताब्दी
•कॉर्न लॉ
• तकनीक का योगदान
•19वीं सदी के अंतिम में उपनिवेशवाद
• रिंडरपेस्ट या मवेशी प्लेग
•भारत से अनुबंधित श्रमिकों का जाना
• विदेशों में भारतीय उद्ग्मी
•भारतीय व्यापार उपनिवेश और वैश्विक व्यवस्था
• महायुद्ध के बीच अर्थव्यवस्था
•युद्ध कालीन रूपांतरण
• युद्धोतर सुधार
•बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग की शुरुआत
• महामंदी
•भारत और महामंदी
•युद्ध के बाद के समझौते
•ब्रिटेन वुड्स समझौता
• नया अंतरराष्ट्रीय आर्थिक आदेश
• चीन में नई आर्थिक नीति
•बहुराष्ट्रीय कंपनियां
•वीटो
•टैरिफ
•विनिमय दर
वैश्वीकरण किसे कहते हैं?
वैसी आर्थिक प्रणाली जिसमें व्यक्तियों, सामानों और नौकरियों का एक देश से दूसरे देश तक स्थानांतरित होता है। उसे वैश्वीकरण कहते हैं।
भूमंडलीकरण का परिभाषा
भूमंडलीकरण में दुनिया भर में सांस्कृतिक राजनीतिक आर्थिक धार्मिक और सामाजिक प्रणालियों का एकीकरण होता है। यानी वस्तुओं और सेवाओं, पूंजी और श्रम का व्यापार दुनियाभर में किया जाता है।
प्राचीन काल
1.पुजारियों, व्यापारियों तथा यात्रियों ने जान अवसर और आध्यात्मिक पूर्ति के लिए या उत्पीड़न से बचने के लिए विशाल दूरी तय कि
2.वे अपने साथ सामान पैसा अविष्कार यहां तक की बीमारियों और रोगाणुओं भी ले गए।
3.रेशम मार्ग ने चीन को पश्चिमी देशों से जोड़ा
4.भोजन ने अमेरिका से यूरोप और एशिया की यात्रा किया।
5.नूडल्स चीन से इटली की दूरी तय किया
रेशम मार्ग
यह मार्ग पूरे इतिहास का ऐसा ऐतिहासिक व्यापार मार्ग था जो कि दूसरी शताब्दी से 14 वी शताब्दी तक भारत फ्रांस, चीन,ग्रीस और अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए एशिया से भूमध्यसागरीय तक फैला था और इस दौरान हुए भारी रेशम व्यापार के चलते इस सिल्क रूट करार दिया गया।
यह मार्ग एशिया को यूरोप और उत्तरी अफ्रीका के साथ-साथ विश्व को जमीन और समुद्री मार्ग से जुड़ता था।
रेशम मार्ग की विशेषता
1.इसी मार्ग के जरिए चीन के बर्तन दूसरे देशों तक जाते थे।
2.इसी सिल्क रूट के द्वारा यूरोप से एशिया तक सोना और चांदी आते थे।
3.इसी रास्ते से ईसाई, इस्लाम और बौद्ध धर्म विश्व के विभिन्न भागों तक पहुंच पाए।
4.रेशम मार्गों को दुनिया के सबसे दूर के हिस्सों से जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता था।
भोजन कि यात्रा
1. नूडल -: चीन का ही देन है कि नूडल्स जो यहां से पूरे विश्व में फैला हुआ था तथा भारत में हम इसके देसी संस्करण को वर्षों से इस्तेमाल करते हैं।
आज के कई खाद्य पदार्थ जैसे आलू, मिर्चा, टमाटर, सोयाबीन इत्यादि यूरोप में तब आए जब क्रिस्टोफर कोलंबस ने गलती से अमेरिका का खोज किया।
2. आलू :- आलू के आने के बाद ही यूरोप के लोगों की जिंदगी में काफी ज्यादा बदलाव आया क्योंकि आलू के आने के बाद ही यूरोप के लोग इस स्थिति में आ पाए कि अच्छा खाना खा पाए।
आयरलैंड के किसान आलू पर इतने निर्भर थे कि 1840 के दशक में मध्य में किसी बीमारी से आलू की फसल तबाह हो गए तो कई लोग भूख के कारण मर गए और उस काल को आयरिश अकाल के नाम से जाना जाता है।
अमेरिका का खोज
16 वी सदी में यूरोप के नाविकों ने एशिया और अमेरिका के देशों के लिए समुद्री मार्ग की खोज लिया था। नए समुद्री मार्ग की खोज के बाद ना सिर्फ बाजार को फैलने में मदद मिली बल्कि विश्व के अन्य भागों में यूरोप की फतह कि नींव भी रखी।
यूरोपियन का अमेरिका पर विजय
16वीं सदी के बीच में पुर्तगाल और स्पेन के द्वारा अमेरिकी उपनिवेश कि अहम शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन यूरोपियन कि यह जीत हथियार के कारण नहीं बल्कि एक बीमारी के कारण हुआ था। यूरोप के लोगों पर चेचक का आक्रमण पहले से ही हो चुका था और वह इनका इलाज जानते थे
लेकिन जब अमेरिकी पूरी दुनिया से अलग था तो इसको इस बीमारी और इसका इलाज का ज्ञान नहीं था और जब यूरोप के लोग वहां पहुंचे तो वह अपने साथ चेचक के रोगाणु दिलाएं। इसका परिणाम यह हुआ कि चेचक ने अमेरिका के कुछ भागों से पूरी आबादी है। साफ कर दी
यूरोप मे समस्याएँ
1.गरीबी
2.बीमारी
3.धार्मिक टकराव यानी धर्म के खिलाफ बोलने वाले कई लोग सजा के डर से अमेरिका भाग गए
18 वीं सदी तक भारत और चीन
इस समय में चीन तथा भारत पूरे विश्व के सबसे बड़े धनी देश हुआ करते थे, लेकिन 15 वी सदी में ही चीन ने बाहरी संपर्क पर रोक लगाना शुरू किया था और दुनिया के बाकी भागों से अलग हो गया था।
19वीं सदी
इस सदी में दुनिया काफी तेजी से बदल रहा था। इसी काल में सामाजिक राजनीतिक आर्थिक और तकनीकी के क्षेत्र में बहुत जटिल बदलाव हुए थे। इसी बदलाव की वजह से ही विभिन्न देशों के रिश्तो के समीकरण में अभूतपूर्व बदलाव आए।
आर्थिक आदान-प्रदान तीन प्रकार से होते थे जो इस तरह है
1.)पहला प्रवाह
2.)श्रम प्रवाह
3.)पूंजी प्रवाह
1.) पहला प्रवाह :-इसमें वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था जैसे कपड़ा या गेहूं का
2.) श्रम प्रवाह :- काम या रोजगार की तलाश में यहां से वहां जाना
3.) पूंजी प्रवाह :-यह प्रवाह कम यह अधिक समय के लिए दूर-दराज के इलाकों में होता था
कॉर्न लॉ
यह वह कानून था जिसके सहारे सरकार ने मक्के के के आयात पर पाबंदी लगा दी और कुछ दिनों के बाद ब्रिटेन में जनसंख्या बढ़ गई और भोजन की मांग में वृद्धि हो गई।
भोजन की मांग में वृद्धि से कृषि आधारित सामानों में भी वृद्धि हो गए। इससे पहले कि ब्रिटेन में भुखमरी जैसी समस्या उत्पन्न हो, उससे पहले ही सरकार के द्वारा। कॉर्न लॉ को समाप्त कर दिया गया जिससे अलग-अलग देश के व्यापारियों ने ब्रिटेन में भोजन का निर्यात शुरू कर दिया और विकास होने लगा।
तकनीक का योगदान
पूरे दुनिया के अर्थव्यवस्था में भूमंडलीकरण में टेक्नोलॉजी ने भी अपना अहम कदम उठाया। इस काल में कुछ मुख्य तकनीक का खोज हुआ जैसे-: रेलवे, टेलीग्राम और स्टीम शिप इत्यादि
19वीं सदी के अंतिम में उपनिवेशवाद
एक ओर व्यापार के फैलने से यूरोप में लोगों की जिंदगी सुधर रही थी तो वहीं दूसरी ओर उपनिवेश के लोगों पर बुरा प्रभाव पड़ा।
रिंडरपेस्ट या मवेशी प्लेग
यह प्लेग की तरह मवेशियों में फैलने वाला बीमारी था जो 1890 ईस्वी के दशक में अफ्रीका में बड़ी मात्रा में तेजी से फैला
यह बीमारी उन घोड़ों के साथ आई थी जो ब्रिटिश एशिया से लाए थे। ऐसा उन सभी इटालियन सैनिकों के मदद के लिए किया गया था जो पूर्वी अफ्रीका में एरिया पर आक्रमण कर रहे थे
यह बीमारी अफ्रिका में आग की तरह फैल गया। इस दौरान अफ्रीका के 90% मवेशियों की आबादी समाप्त हो गई जिसका प्रभाव रोजी-रोटी पर बुरा प्रभाव पड़ा। अब उनके पास खानों और बागानों में मजदूरी करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
भारत से अनुबंधित श्रमिकों का जाना
वैसे मजदूर जो किसी खास मालिक के लिए निश्चित समय तक ही उनके प्रतिबंध में होते हैं, उन्हें बंधुआ मजदूर करते हैं।
बिहार, यूपी एमपी और तमिलनाडु जैसे सूखाग्रस्त इलाकों से कई गरीब लोग बंधुआ मजदूर बन गए। उन्हें मुख्य रूप से कैरीबियन आईलैंड, फिजी जैसे देशों में भेजा गया। भारत में कई बंधुआ मजदूर को असम के चाय बागानों में भी काम पर लगाया गया।
इनके एजेंट इन्हें झूठे वादे करके इन्हें कई बार खतरनाक जगह पर भेज देते थे। जहां पर उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं हुआ करता था और उन्हें कठिन समय में भी काम करना पड़ता था और 1900 के दशक में भारत में कुछ राष्ट्रवादी लोग बंधुआ मजदूर के सिस्टम का विरोध करने लगे और 1921 se यह सिस्टम को समाप्त कर दिया गया।
विदेशों में भारतीय उद्ग्मी
भारत के नामी बैंकर और व्यवस्थाओं में शिकारीपुरी श्रॉफ और नाट्टुकोत्तई चेट्टियार का नाम आता है। यह भारत में और विश्व के विभिन्न भागों में पैसा भेजने के लिए उनका अपना ही एक परिष्कृत सिस्टम हुआ करता था।
भारतीय व्यापार उपनिवेश और वैश्विक व्यवस्था
भारत में अच्छी किस्म के कॉटन वर्षों से यूरोप में निर्यात होता था लेकिन इंडस्ट्रियलआईजेशन के बाद स्थानीय उत्पादों ने ब्रिटिश सरकार को भारत से आने वाले कॉटन के कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने के लिए विवश किया, जिसके कारण ब्रिटेन में बने कपड़े भारत के बाजारों में भारी मात्रा में आने लगे। 1800 में भारत के निर्यात में 30% हिस्सा कॉटन के कपड़ों का था। 1815 में यह गिरकर 15% हो गया और 1870 आते-आते तक 3% ही रह गया। लेकिन 1812 से 1871 तक का कॉटन का निर्यात 5% से बढ़कर 35% हो गया और इसी दौरान नील में तेजी से बढ़ोतरी हुई।
भारत से ब्रिटेन को कच्चे माल और अनाज का निर्यात बढ़ने लगा और ब्रिटेन से तैयार माल का आयात बढ़ने लगा। इस तरह से बैलेंस ऑफ पेमेंट ब्रिटेन के हित में था। भारत के बाजार से जो आमदनी होती थी उनका इस्तेमाल ब्रिटेन का उपनिवेश की देखरेख में करता था।
और भारत में रहने वाले ऑफिसर को होम चार्ज देने के लिए करता था।
महायुद्ध के बीच अर्थव्यवस्था
1.) प्रथम विश्वयुद्ध मुख्य रूप से यूरोप में लड़ा गया।
2.)इस समय में पूरे विश्व में आर्थिक राजनीतिक अस्थिरता और दैनिक युद्ध का अनुभव किया।
3.)प्रथम विश्वयुद्ध दो गुटों के बीच लड़ा गया था, जिसमें पहला पक्ष में ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और बाद में अमेरिका शामिल हुआ था तो दूसरी पक्ष में जर्मनी ऑस्ट्रिया, हंगरी और ऑटोमन तुर्की था।
4.) यह युद्ध चार सालों तक चला
युद्ध कालीन रूपांतरण
इस विश्वयुद्ध से पूरे दुनिया को कई मायनों में झकझोर कर रख दिया जिसमें लगभग 90 लाख लोग मारे गए और दो करोड़ लोग घायल हो गए।
मरने या घायल होने वाले लोग ज्यादातर लोग कमाने वाले उम्र के थे। इससे यूरोप में सक्षम शरीर वाले कारीगरों की संख्या में कमी हुई जिससे यूरोप में लोगों की आमदनी घट गई।
ज्यादातर लोगों को युद्ध में शामिल होने के लिए जबरन बाध्य किया गया जिससे कारखानों में महिलाओं को काम करना पड़ा।
इस महायुद्ध के बाद विश्व के कई बड़ी आर्थिक शक्तियों के बीच के संबंध टूट गए। ब्रिटेन को युद्ध के खर्चे। को उठाने के लिए अमेरिका से कर्ज लेना पड़ा और इस युद्ध मे अमेरिका अंत्रस्तीय स्तर पर कर्जदार देने वाला बन गया
युद्धोतर सुधार
जब ब्रिटेन युद्ध में व्यस्त था तब भारत और जापान में उद्योग का विकास हुआ। युद्ध के बाद ब्रिटेन पर अमेरिका का भारी दबदबा था और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटेन जापान से टक्कर लेने में असक्षम था।
युद्ध के समय ब्रिटेन में चीजों की मांग में तेजी से वृद्धि हुई जिससे वहां की अर्थव्यवस्था फल-फूल रही थी। लेकिन युद्ध समाप्त होने तक मांग में गिरावट आई जिसके बाद ब्रिटेन में 20% कामगारों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
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बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग की शुरुआत
अमेरिका की अर्थव्यवस्था में युद्ध के बाद के झटको से तेजी से निजात मिलने लगे। 1920 के दशक में बड़े पैमाने पर उत्पादन अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मुख्य पहचान बन गए।
फोर्ड मोटर के संस्थापक हेनरी फोर्ड , प्रोडक्शन के पिता जाने जाते हैं। बड़े पैमाने पर उत्पादन करने से उत्पादन क्षमता बढ़ी और कीमतें घटी अमेरिका के कामगार बेहतर कमाने लगे इसलिए उनके पास खर्च करने के लिए ज्यादा पैसे थे जिससे उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ी
कार का उत्पादन 1919 ईस्वी मे 20 लाख से बढ़कर 1929 में 5000000 हो गया इसी तरह से। बाजारी सामानों एसी, वाशिंग मशीन, रेडियो, ग्रामोफोन इत्यादि की मांग भी तेजी से बढ़ने लगी।
इस तरह अमेरिकी अर्थव्यवस्था खुशहाल बन गई। 1923 में अमेरिका ने दुनिया के अन्य हिस्सों को पूंजी निर्यात करना शुरू किया और सबसे बड़ा विदेशी साहूकार बन गया।
महामंदी
महामंदी की शुरुआत 1929 ईस्वी से प्रारंभ हुई और यह संकट किस के दशक के बीच तक बना रहा। इस दौरान विश्व के ज्यादातर हिस्सों में उत्पादन रोजगार और आय व्यापार में बहुत बड़ी गिरावट दर्ज हुई।
युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था बहुत कमजोर हो गई थी किमते गिरी तो किसानों की आय घटने लगी और आमदनी बढ़ाने के लिए किसान अधिक मात्रा में उत्पादन करने लगे।
बहुत सारे देशों ने अमेरिका से कर्ज लिया। हजारों बैंक दिवालिया हो गए।
भारत और महामंदी
1928 से लेकर 1934 के बीच देश में आयात निर्यात घटकर आधा हो गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिरने से भारत में गेहूं की कीमत 50% तक गिर गई। किसानों और काश्तकारों को भारी नुकसान हुआ
युद्ध के बाद के समझौते
दूसरा विश्वयुद्ध पहले विश्वयुद्ध की तुलना में काफी अलग था। इसमें आम नागरिक अधिक संख्या में मारे गए और कई महत्वपूर्ण शहर बुरी तरह से बर्बाद हो गए।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद की स्थिति में सुधार मुख्य रूप से दो बातों से प्रभावित हुए थे।
1.)पश्चिमी में अमेरिका का एक प्रबल आर्थिक राजनैतिक और सामाजिक शक्ति के रूप में उदय
2.)सोवियत यूनियन का एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था से विश्व शक्ति के रूप में परिवर्तन
विश्व के नेताओं के बीच मीटिंग हुई और दो बातों पर ज्यादा ध्यान दिया गया
1.)औद्योगिक देशों में आर्थिक संतुलन को बरकरार रखना और पूर्ण रोजगार दिलवाना
2.)पूंजी सामान और कामगारों के प्रभाव पर बाहरी दुनिया के प्रभाव को नियंत्रित करना
ब्रेटन वुड्स- वुड्स समझौता
1.)1944 में अमेरिका स्थित न्यू हेंपशायर के ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन में सहमति बनी थी।
2.)अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की स्थापना की 3.)यह व्यवस्था विनिमय दरों पर आधारित थी।
नया अंतरराष्ट्रीय आर्थिक आदेश
1.)ज्यादातर विकासशील देशों को 1954 और 60 के दशक में पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के तेज दिखा। से लाभ नहीं हुआ।
2.)उन्होंने खुद को एक समूह के रूप में संगठित किया। नए अंतरराष्ट्रीय आर्थिक आदेश की मांग के लिए 77 या G-77 का समूह
3.)यह ऐसी प्रणाली थी जो उन्हें अपने प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक विकास सहायता कच्चे माल के लिए उचित मूल्य और विकसित देशों के बाजारों में उनके निर्मित सामानों के लिए बेहतर पहुंचकर वास्तविक नियंत्रण प्रदान करेगी।
चीन में नई आर्थिक नीति
1.)इन देशों में मजदूरी बहुत कम थी
2.)चीन अर्थव्यवस्था की कम लागत वाली संरचना में इसके उत्पादों को सस्ता कर दिया।
3.)इस की नई नीति विश्व अर्थव्यवस्था की तरह लौट गई।
बहुराष्ट्रीय कंपनियां
ऐसी कंपनी जो एक ही समय में कई देशों में काम करें। एमएनसी का विश्वव्यापी प्रसाद 1950 और 1960 के दशक में एक उल्लेखनीय विशेषता थी क्योंकि दुनिया भर में अमेरिकी व्यापार का विस्तार हुआ था।
बिटो
एक कानून द्वारा किए गए प्रस्ताव को अस्वीकार करने का संवैधानिक अधिकार
टैरिफ
एक देश के आयात या निर्यात पर दूसरे देश द्वारा लगाया जाने वाला कर जो प्रवेश के बिंदु पर लगाया जाता है।
विनिमय दर
यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रयोजनों के लिए राष्ट्रीय मुद्राओं को जोड़ती है। मोटे तौर पर दो प्रकार की विनिमय दर होती है।
1.)निश्चित विनिमय दर
2.)अनिश्चित विनिमय दर
आपने क्या सिखा…
1.)वैश्वीकरण मे एक देश दूसरे देश के साथ वस्तुओ का स्थात्रि करता हैं
2.) रेशम मार्ग बहुत बड़ा मार्ग था
3.) रेशम मार्ग के जरिये चीन बर्तन दूसरे देशों मे बेचता था
4.) नूडल चीन से पूरे वर्ल्ड मे फैला
5.) टैरिफ एक प्रकार का कर होता हैं
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